भोजन मन्त्र
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।
brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam
brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā
अर्थ:- जिसमें अर्पण किया जाता है, वह ब्रह्म है। अर्पित की जाने वाली सामग्री ब्रह्म है। ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा जो आहुति दी जाती है, वह भी ब्रह्म ही है।
जो व्यक्ति ब्रह्म में स्थित होकर अपने कर्म को ब्रह्म को समर्पित करता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।
Meaning:- The offering is Brahman. The oblation is Brahman. It is offered by Brahman into the fire of Brahman.
One who performs actions with the awareness of Brahman and dedicates them to Brahman ultimately attains Brahman.
यह मंत्र भगवद्गीता 4.24 का श्लोक है और भोजन के समय बोलने का मुख्य भाव यह है कि भोजन को केवल स्वाद या शरीर की आवश्यकता न मानकर ईश्वर को समर्पित कर्म के रूप में ग्रहण किया जाए।
भोजन से पहले इसे बोलने के पीछे कुछ प्रमुख भाव हैं
- भोजन को ईश्वर को समर्पित करना
भोजन यानी हवि, भोजन करने वाला, भोजन की प्रक्रिया और पाचन की अग्नि, इन सबमें उसी परम तत्व को देखना। - कृतज्ञता का भाव
भोजन हमारे पास कैसे पहुँचा, उसमें प्रकृति, किसान, अन्नदाता और अनेक लोगों का योगदान है। मंत्र मन में धन्यवाद और सम्मान का भाव पैदा करता है। - भोजन को यज्ञ मानना
जैसे यज्ञ में अग्नि में आहुति दी जाती है, वैसे ही भोजन शरीर की जठराग्नि में एक प्रकार की आहुति माना जाता है। इसलिए भोजन करना भी एक पवित्र कर्म के रूप में देखा जाता है। - मन को शांत करके भोजन करना
मंत्र बोलने से भोजन शुरू करने से पहले मन कुछ क्षणों के लिए स्थिर होता है। इससे भोजन को जल्दबाजी या केवल लालच से खाने के बजाय सजगता के साथ ग्रहण करने का भाव बनता है।
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